Monday, October 31, 2011

काव्य-कुञ्ज

~~~~~~~~~~~~धर्मवीर भारती~~~~~~~~~~~~~
सुनो
सच बतलाना
क्या तुमको कभी भी
किसी ने भी
इतना उजला, कोमल, पारदर्शी प्यार दिया?

~~~~~~~~~~~~धर्मवीर भारती~~~~~~~~~~~~~
वह तुम्हे पाने न पाने की अजब सी टीस
रीती नहीं-रीती नहीं
शाम में घुलती हुई वह फूल-सी दुपहर
बीतकर भी अभी बीती नहीं-बीती नहीं

~~~~~~~~~~~~धर्मवीर भारती~~~~~~~~~~~~~
ख़ामोशी छाती है
एक लहर आती है
सहसा दो नीरव होठों की सार्थकता
दो कांपते होठों तक आने में रह जाती है

~~~~~~~~~~~~धर्मवीर भारती~~~~~~~~~~~~~
इस सबसे केवल इतना ज़ाहिर होता है
यों दुनिया दिखलावे की बात भले कुछ हो
इस पहले पहले पावन आत्म-समर्पण को
कोई भी भूल नहीं पता
चाहे मैं हूँ, चाहे तुम हो!

~~~~~~~~~~~~गुलज़ार~~~~~~~~~~~~~
माँ ने इक चाँद-सी दुल्हिन की दुआएँ दी थीं

आज की रात जो फ़ुटपाथ से देखा मैंने
रात-भर रोटी नज़र आया है वो चाँद मुझे

~~~~~~~~~~~~अज्ञेय~~~~~~~~~~~~~
साँप !

तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ--(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना--

विष कहाँ पाया?

~~~~~~~~~~~~बच्चन~~~~~~~~~~~~~
जिसने कलियों के अधरों में
रस रक्खा पहले शरमाये,
जिसने अलियों के पंखों में
प्यास भरी वह सिर लटकाए

आँख करे वो नीची जिसने
यौवन का उन्माद उभारा,
मैं सुख पर, सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नहीं है|

~~~~~~~~~~~~दिनकर~~~~~~~~~~~~~
तू तरुण देश से पूछ अरे,
गूँजा यह कैसा ध्वंस-राग ?
अम्बुधि-अन्तस्तल-बीच छिपी
यह सुलग रही है कौन आग ?
....
.....
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद,
रे तपी ! आज तप का न काल |
नव-युग-शंखध्वनी जगा रही,
तू जाग, जाग, मेरे विशाल !

No comments:

Post a Comment