तुम ज़माने की राह से आये
वरना सीधा था रास्ता दिल का
~बाक़ी सिद्दिक़ी
लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यूँ अब रहो तन्हा कोई दिन और
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
क्या खूब! क़यामत का है गोया कोई दिन और
~ग़ालिब
गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम उम्र क़यामत का इंतज़ार किया
~दाग
ज़रा सी बात का इतना मलाल करते हो
शिकायतें भी वहीँ हैं जहाँ मोहब्बत है
~बशीर 'बद्र'
वो भी मेरे पास से गुज़रा इसी अंदाज़ से
मैंने भी ज़ाहिर किया जैसे उसे देखा ना हो
~नौ बहार साबिर
ईश्क सुनते थे जिसे हम, वोह यही है शायद
वरना सीधा था रास्ता दिल का
~बाक़ी सिद्दिक़ी
लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यूँ अब रहो तन्हा कोई दिन और
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
क्या खूब! क़यामत का है गोया कोई दिन और
~ग़ालिब
गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम उम्र क़यामत का इंतज़ार किया
~दाग
ज़रा सी बात का इतना मलाल करते हो
शिकायतें भी वहीँ हैं जहाँ मोहब्बत है
~बशीर 'बद्र'
वो भी मेरे पास से गुज़रा इसी अंदाज़ से
मैंने भी ज़ाहिर किया जैसे उसे देखा ना हो
~नौ बहार साबिर
ईश्क सुनते थे जिसे हम, वोह यही है शायद
खुद-ब-खुद दिल में हैं इक शख्स समाया जाता
--हाली
दर्दसे वाकिफ़ न थे, गमसे शनासाई न थी
हाय क्या दिन थे, तबियत जब कहीं आई न थी
-- जलील मानिकपुरी
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो ना थी
-- अनजान
कौन कहता है तुझे मैंने भुला रक्खा है
तेरी यादों को कलेजे से लगा रक्खा है
लब पे आहें भी नहीं आँख में आँसू भी नहीं
दिल ने हर राज़ मुहब्बत का छुपा रक्खा है
तूने जो दिल के अंधेरे में जलाया था कभी
वो दिया आज भी सीने में जला रक्खा है
देख जा आ के महकते हुये ज़ख़्मों की बहार
मैंने अब तक तेरे गुलशन को सजा रक्खा है
-- अनजान
आप भी आइए हमको भी बुलाते रहिए
दोस्ती ज़ुर्म नहीं दोस्त बनाते रहिए।
ज़हर पी जाइए और बाँटिए अमृत सबको
ज़ख्म भी खाइए और गीत भी गाते रहिए।
वक्त ने लूट लीं लोगों की तमन्नाएँ भी,
ख़्वाब जो देखिए औरों को दिखाते रहिए।
शक्ल तो आपके भी ज़हन में होगी कोई,
कभी बन जाएगी तसवीर बनाते रहिए।
-- अनजान
खावाहिशों के आंगन में रात दिन बसेरे थे,
तितलियाँ तुम्हारी थीं और फूल मेरे थे,
चाँद असमानों से जब ज़मीन पे उतरा था,
देखने में रातें थीं असल में सवेरे थे,
तेरे पास बसने की खाई थी कसम लेकिन,
शहर भी पराया था लोग भी लुटेरे थी,
लुट गए हम दोनों तो क़सूर किस के थे,
खवाहिशें भी तेरी थी फैसले भी तेरे थे...!!
--अनजान
कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा
--अनजान
सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा
मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा
--अनजान
हमारे हिस्से में कर्बला है, यही बहूत है
--अनजान
तुम्हारे हुस्न के बारे में कौन बताएगा
जो देखता है वह आँखों में डूब जाता है
--अनजान
हमें भी जलवागाहे-नाज़ पर लेकर चलो मूसा
तुम्हे गस आ गया तो हुस्ने-जाना कौन देखेगा
-अनजान
दिल अजब शहर है ख्यालों का
लूट मारा है हुस्न वालों का
--अनजान
फिरते थे दस्त-दस्त दीवाने किधर गए
वो आशिकी के हाय ज़माने किधर गए
--अनजान
भला हुआ कि कोई और मिल गया तुम सा
वगरना हम भी किसी दिन तुम्हें भुला देते
--अनजान
नज़र बचाने का फन तुम्ही को आता है
मगर तुम्हारी तरह कोई देखता भी नहीं
--अनजान
उसको सोंचुं उसी को चाहूँ मैं
इससे ज्यादा ना बंदगी होगी
-अनजान
कोई नहीं आएगा तेरे शिवा मेरी जिंदगी में
एक मौत ही है जिसका मैं वादा नहीं करता
--अनजान
हम उन्हें टूटकर चाहें तो हमारी फितरत है
वो भी हो मेरा तलबगार जरूरी तो नहीं
--अनजान
जो चीज़ नहीं बस की फिर उसकी शिकायत क्या
जो कुछ नज़र आता है, अच्छा नज़र आता है
-अनजान
दिल की तह की कही नहीं जाती, नाज़ुक है असरार बहुत
अंछर हैं तो 'इश्क' के दो ही, लेकिन है बिस्तार बहुत
काफ़िर मुस्लिम, दोनों हुए, पर निस्बत उससे कुछ न हुई
बहुत लिए तस्बीह फिरे हम, पहना है जुन्नार बहुत
हिज्र ने जी ही मारा हमारा, क्या कहिये क्या मुश्किल है
उससे जुदा रहना होता है, जिससे हमें है प्यार बहुत
--मीर
नतीजा एक ही निकला कि थी किस्मत में नाकामी
कभी कुछ कहके पछताए, कभी चुप रहके पछताए
--अनजान
वह शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गयी जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में
--फ़िराक
तुम्हें भी याद नहीं और मैं भी भूल गया
वो लम्हा कितना हसीं था मगर फ़ुज़ूल गया
--फ़िराक
सँभाला होश तो मरने लगे हसीनोंपर
हमें तो मौत ही आई शबाब के बदले
--अनजान
करने गये थे उससे तगाफुल का हम गिला
की एक ही निगाह कि बस ख़ाक हो गये
--मीर
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ
कुछ ना समझे खुदा करे कोई
जब तवक्को ही उठ गयी 'ग़ालिब'
क्यूँ किसी का गिला करे कोई
--मीर
मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ ज़ज़्बा-ए-दिल
उसपे बन जाए कुछ ऐसी की बिन आए ना बने
--ग़ालिब
ग़ालिब ना कर हुज़ूर में तू बार बार अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उनपर कहे बगैर
--ग़ालिब
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
--मीर
मुझसे जो चाहे रूठ सकता है
मैं किसी से खफा नहीं होता!
--अनजान
कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
--अनजान
आपको मैने निगाहों में बसा रखा है
आईना छोड़िए आईने में क्या रखा है
--अनजान
ये नाज़े हुस्न तो देखो कि दिल को तड़पाकर
नज़र मिलाते नहीं, मुस्कुराये जाते हैं
--अनजान
उसके रंग खिला है शायद, कोई फूल बहार के बीच
शोर पड़ा है कयामत का सा, चार तरफ गुलज़ार के बीच
--मीर
धमकी में मर गया जो न बाबे नबर्द था|
इश्क़े नबर्द पेशा, तलबगारे मर्द था||
--ग़ालिब
काशिद के आते-आते खत इक और लिख रखूँ
मुझे मालूम है वो क्या लिखेंगे जवाब में
--ग़ालिब
कुछ दीवानापन, और कुछ आवारगी मेरी
कोई रूठा, किसी और को माना लाए हम
--ग़ालिब
वो गुस्से से देखें, मगर देखते तो हैं
मैं खार हूँ तो हूँ, मगर हूँ तो किसी की निगाह में
--मीर
गई वो बात कि हो गुफ़्तगू तो क्यूंकर हो|
कहे से कुछ ना हुआ, फिर कहो तो क्यूंकर हो||
हमें फिर उनसे उम्मीद और उन्हें हमारी कद्र|
हमारी बात ही पूछे न वो तो क्यूंकर हो||
--मीर
क्या लुत्फ़-ए-तन छुपा है, मिरे तंग पोष का|
उगला पड़े है जामे से उसका बदन तमाम||
--मीर
ऐसा आसां नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ?..
--ग़ालिब
समझे थे हम तो मीर को 'आशिक़' उसी घड़ी|
जब सुन के तेरा नाम वह बेताब-सा हुआ||
--मीर
हम फकीरों से बेअदाई क्या
आन बैठे जो तुमने प्यार किया
सख़्त काफ़िर था जिनने पहले मीर
मज़हब-ए-इश्क़ इख्तियार किया
--मीर
मुझे तमाम ज़मानेकी आरज़ू क्यों हो
बहुत है मेरे लिए एक आरज़ू तेरी
--मीर
बेकली, बेखुदी, कुछ आज नहीं
एक मुद्दत से, वह मिज़ाज नहीं
हमने अपनी सी की बहुत, लेकिन
मर्ज़-ए-इश्क़ का, इलाज़ नहीं
--मीर
बिखरे है ज़ुल्फ, उस रुख़-ए-आलम फ़रोज़ पर
वर्नह, बनाव होवे न दिन और रात का
--मीर
सँभाला होश तो मरने लगे हसीनों पर
हमें तो मौत ही आई शबाब के बदले
--अनजान
इस दर्द-ए-मोहब्बत के अंदाज़ निराले हैं
घटता तो मरज होता बढ़ता तो दवा होता
--अनजान
मैं तुम्हारा आईना था, मैं तुम्हारा आईना हूँ
मुझे देख कर सँवरती, तो कुछ और बात होती
ये खुली-खुली सी जुल्फें, इन्हें लाख तुम सँवारो
मेरे हाथ से सँवरते, तो कुछ और बात होती
--अनजान
मैनें माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त आए तो बुरा क्या है?
--ग़ालिब
मंज़िल ना दे चराग ना दे हौसला तो दे
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे
पिला दे ओक से साक़ी जो हमसे नफ़रत है
प्याला गर नहीं देता ना दे, शराब तो दे
दिखाके जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हमको
ना दे जो बोसा, तो मुँह से कहीं जवाब तो दे
--ग़ालिब
‘ग़ालिब’ ना कर हुज़ूर में तू बार-बार ‘अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर
--ग़ालिब
जिन-जिन को था यह 'इश्क़ का आज़ार मर गये
अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गये
सद कारवाँ वफ़ा है, कोई पूछ्ता नहीं
गोया मता'-ए-दिल के ख़रीददार मर गये
--मीर
होंठों पे कभी उनके मेरा नाम ही आए
आए तो सही बार-सर-ए-इल्ज़ाम ही आए
--अनजान
रंग लेती है सब हवा उसका
उससे बाग-ओ-बहार हैं रस्ते
इक निगह करके, उनने मोल लिया
बिक गए आह, हम भी क्या सस्ते
--मीर
हिना से यार का पंजः नहीं है गुल के रंग
हमारे उनने कलेजों में हाथ डाला है
--मीर
हमें तो एक घड़ी, गुल बिगैर दूभर है
खुदा ही जाने की अब कब तलक बहार आवे
नहीं है चाह भली इतनी भी, दुआ कर मीर
कि अब जो देखूं उसे मैं, बहुत न प्यार आवे
--मीर
क्या तन-ए-नाजुक है, जाँ को भी हसद जिस तन प है
क्या बदन का रंग है, तह जिसकी पैराहन प है
तू तो कहता है कि मैंने इस तरफ देखा नहीं
खून-ए-नाहक मीर का, यह किसकी फिर चितवन प है
--मीर
अपने ही दिल का गुनह है, जो जलाता है मुझे
किसको ले मरिये मियाँ, और किसे तोहमत दीजे
--मीर
चाहें तो तुम चाहें, देखें तो तुमको देखें
ख्वाहिस दिलों की तुम हो, आँखों की आर्ज़ू तुम
निस्बत तो हमदिगर है, गो दूर की हो निस्बत
हम हैं नवा-ए-बुलबुल, हो गुल के रंग-ओ-बू तुम
--मीर
घर में आईने के, कब तक तुम्हे नाज़ाँ देखूं
कभू तो आओ मिरे दीदः-ए-हैरान के बीच
--मीर
दिल की तह की कही नहीं जाती, नाज़ुक है असरार बहुत
अंछर हैं तो 'इश्क' के दो ही, लेकिन है बिस्तार बहुत
काफ़िर मुस्लिम, दोनों हुए, पर निस्बत उससे कुछ न हुई
बहुत लिए तस्बीह फिरे हम, पहना है जुन्नार बहुत
हिज्र ने जी ही मारा हमारा, क्या कहिये क्या मुश्किल है
उससे जुदा रहना होता है, जिससे हमें है प्यार बहुत
--मीर
फूल गुल, सम्स-ओ-कमर, सारे ही थे
पर हमें उनमे, तुम्ही भाये बहुत
वह जो निकला सुब्ह, जैसे आफ़्ताब
रश्क से गुल फूल, मुरझाये बहुत
मीर से पूछा जो मैं, 'आशिक हो तुम
हो के कुछ चुपके से, शर्माये बहुत
--मीर
इश्क हमारे खयाल पड़ा है, ख्वाब गया आराम गया
जी का जाना ठहर रहा है, सुबह गया या शाम गया
--मीर
गज़ल के साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-'मीर' सुनाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-दर्द में एक जिंदगी तो होती है
नवा-ए-दर्द सुनाओ बड़ी उदास है रात
--मीर
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