Tuesday, November 1, 2011

शेर-ओ-सुखन - २ (Sher-o-Sukhan - 2)

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको

मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको

ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको

मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे
तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ "क़तील"
शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको

~ क़तील शिफ़ाई
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कुछ खटकता तो है पहलू में रह रहकर
अब ख़ुदा जाने तेरी याद है या दिल मेरा

~जिगर मुरादाबादी
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चेहरे पे बेरहमी है, तबस्सुम नज़र में है
अब क्या कमी ताबाहिये-क़ल्बो-जिगर में है

समझे थे तुझसे दूर निकल जायेंगे कहीं
देखा तो हर मक़ाम तेरी रहगुज़र में है

~जिगर मुरादाबादी
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ऐ वाईजेनादाँ करता है तू एक क़यामत का चर्चा
यहाँ रोज निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज क़यामत होती है

जो आके रुके दामन पे सबा वो अश्क नहीं है पानी है
जो अश्क न छलके आँखों से वो अश्क नहीं है पानी है

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मुझे नींद नहीं आती कुछ और वज़ह होगी
अब हर ऐब के लिए कुसूरवार इश्क तो नहीं!

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क्या चीज़ थी क्या चीज़ थी ज़ालिम की नज़र भी
उफ़: कर के वहीं बैठ गया दर्दे-जिगर भी

उस दिल के तसद्दुक जो मुहब्बत से भरा हो
उस दर्द के सदके जो इधर भी है उधर भी

~जिगर मुरादाबादी
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गुदाज़े-इश्क नहीं कम जो मैं जवां न रहा
वही  है आग मगर आग में धुवाँ न रहा

हिजाबे-इश्क को ऐ दिल बहुत गनीमत जान
रहेगा क्या जो ये पर्दा भी दर्मियाँ न रहा

चमन तो बर्के-हवादिस से हो गया महफूज़
मेरी बला से अगर मेरा आशियाँ न रहा

कमाले-कुर्ब भी शायद है ऐन बोद जिगर
जहाँ जहाँ वो मिले मैं वहाँ वहाँ न रहा

~जिगर मुरादाबादी
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हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हमसे जमाना खुद है ज़माने से हम नहीं

शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हकिक़तन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं

~जिगर मुरादाबादी
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जब उखड़ी साँस तो बीमारेगम संभल न सका
हवा थी तेज चरागेहयात जल न सका

चरागेहुस्न तेरा और मेरा चरागेदिल
वह जलके बुझ न सका यह बुझ के जल न सका

~नानक लखनवी
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खुद चले आओ या बुला भेजो
रात अकेले बसर नहीं होती

हम खुदाईमें हो गए रुसवा
मगर उनको खबर नहीं होती

किसी नादाँसे जो कही जाये
बात वह मुख़्तसर नहीं होती

जबसे अश्कों ने राज़ खोल दिया
चार अपनी नज़र नहीं होती

आग दिलमें लगी ना हो जबतक
आँख अश्कों से तर नहीं होती

~आरज़ू लखनवी
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तेरे दर तक आते आते सारी दुनिया छूट गयी
इक दरिया में डूब गए हम इक दरिया को पार किया

~नामालूम
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जिगर किसी का जले दिल जले दीमाग जले
वो कह गए हैं आयेंगे हम चराग जले

~यकरंग
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मुहब्बत को समझना है तो नादाँ खुद मुहब्बत कर
किनारे से कभी अंदाज़ा-ए-तूफाँ नहीं होता

~खुमार बाराबंकवी
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आगे खुदाको इल्म है क्या जाने क्या हुआ
बस उनके मुंह से याद है उठना नक़ाबका
मिन्नतकशेअसर न हुई शुक्र है दुआ
बढ़ता वगर्ना शौक़ दिलेबेहिजाबका

~अजीज लखनवी

इल्म = मालूम
मिन्नतकशेअसर = असरवाली, प्रभावी
दिलेबेहिजाबका = निर्लज्ज दिल का
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इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
~ग़ालिब
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दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक और वो बेज़ार
या इलाही यह माज़रा क्या है

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
~ग़ालिब
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चमकी बिजली सी पर न समझे हम
हुस्न था या ज़माल था या क्या था
~मुसहफ़ी
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बाद मुद्दत के गले मिलते हुए रुकता है दिल
अब मुनासिब है यही कुछ मैं बढूँ कुछ तुम बढ़ो
~ज़ौक
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अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाऊंगा

हम नहीं वो, जो करें खून का दावा तुझपर
बल्कि पूछेगा खुदा भी तो मुकर जायेंगे

पहुंचेंगे रह्गुज़रे-यार तलक हम क्यों कर
पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जायेंगे
~ज़ौक
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